श्रीमदाद्यशंकराचार्यकृतं श्रीहनुमत्पञ्रत्‍‌नस्तोत्रम्

श्रीमदाद्यशंकराचार्यकृतं श्रीहनुमत्पञ्रत्‍‌नस्तोत्रम्
वीताखिलविषयेच्छं जातानन्दाश्रुपुलकमत्यच्छम्।
सीतापतिदूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम्॥
तरुणारुणमुखकमलं करुणारसपूरपूरितापाङ्गम्।
संजीवनमाशासे मञ्जुलमहिमानमञ्जनाभाग्यम्॥
शम्बरवैरिशरातिगमम्बुजदलविपुललोचनोदारम्।
कम्बुगलमनिलदिष्टं विम्बज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे॥
दूरीकृतसीतार्ति: प्रकटीकृतरामवैभवस्फूर्ति:।
दारितदशमुखकीर्ति: पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्ति:॥
वानरनिकराध्यक्षं दानवकुलकुमुदरविकरसदृक्षम्।
दीनजनावनदीक्षं पावनतप:पाकपुञ्जमद्राक्षम्॥
एतत् पवनसुतस्य स्तोत्रं य: पठति पञ्चरत्‍‌नाख्यम्। चिरमिह निखिलान् भोगान् भुक्त्वा श्रीरामभक्तिभाग् भवति॥ अर्थ :- जिनके हृदय से समस्त विषयों की इच्छा दूर हो गयी है, (श्रीराम के प्रेम में विभोर हो जाने के कारण) जिनके नेत्रों में आनन्द के आँसू और शरीर में रोमाञ्च हो रहे हैं, जो अत्यन्त निर्मल हैं, सीतापति श्रीरामचन्द्रजी के प्रधान दूत हैं, मेरे हृदय को प्रिय लगनेवाले उन पवनकुमार हनुमानजी का मैं ध्यान करता हूँ। बाल रवि के समान जिनका मुखकमल लाल है, करुणारस के समूह से जिनके लोचन-कोर भरे हुए हैं, जिनकी महिमा मनोहारिणी है, जो अञ्जना के सौभाग्य हैं, जीवनदान देनेवाले उन हनुमानजी से मुझे बडी आशा है। जो कामदेव के बाणों जीत चुके हैं, जिनके कमलपत्र के समान विशाल एवं उदार लोचन हैं, जिनका शङ्ख के समान कण्ठ और बिम्बफल के समान अरुण ओष्ठ हैं, जो पवन के सौभाग्य हैं, एकमात्र उन हनुमानजी की ही मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने सीताजी का कष्ट दूर किया और श्रीरामचन्द्रजी के ऐश्वर्य की स्फूर्ति को प्रकट किया, दशवदन रावण की कीर्ति को मिटानेवाली वह हनुमानजी की मूर्ति मेरे सामने प्रकट हो। जो वानर-सेना के अध्यक्ष हैं, दावनकुलरूपी कुमुदों के लिये सूर्य की किरणों के समान हैं, जिन्होंने दीनजनों की रक्षा की दीक्षा ले रखी है, पवनदेव की तपस्या के परिणामपुञ्ज उन हनुमानजी का मैंने दर्शन किया। पवनकुमार श्रीहुनमानजी के इस पञ्चरत्‍‌न नामक स्तोत्र का जो पाठ करता है, वह इस लोक में चिर-काल तक समस्त भोगों को भोगकर श्रीराम-भक्ति का भागी होता है।

टोटके

टोटके
व्यापार वृद्धि
१॰ व्यवसाय प्रारम्भ करने से पूर्व पत्नी या माता द्वारा यथासंभव भगवान की पूजा कराए, उसके पश्चात् पेड़े का प्रसाद बांटें तथा नौकरों को एक-एक रुपया बांटें। ऐसा नियमपूर्वक प्रत्येक शुक्रवार को करते रहें।
२॰ यदि ग्राहक कम आते हैं अथवा आते ही न हों तो यह अचूक प्रयोग करें। सोमवार को सफेद चन्दन को नीले डोरे में पिरो लें तथा २१ बार दुर्गा सप्तशती के निम्न मन्त्र से अभिमंत्रित करें-
“ॐ दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः,
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
दारिद्र्य-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या,
सर्वोपकार-करणाय सदाऽऽर्द्र-चित्ता।।”

अब अभिमन्त्रित चंदन को पूजा स्थल पर स्थापित कर दें या कैश-बॉक्स में स्थापित कर दें।
३॰ व्यवसाय स्थल पर श्रीयंत्र का विशाल रंगीन चित्र लगा लें, जिससे सबको दर्शन होते रहें।
४॰ व्यवसाय को नजर-टोक लगी हो अथवा किसी ने तांत्रिक प्रयोग कर दिया हो तो U आकार में काले घोड़े की पुरानी नाल चौखट पर इस प्रकार लगा दें, जिससे सबकी नजर उस पर पड़े।
५॰ व्यवसाय स्थल पर प्रवेश करने से पूर्व अपना नासिका स्वर देखें-जिस नासिका से श्वास चल रहा हो, वही पाँव प्रथम अंदर रखें। यदि दाहिनी नासिका से श्वास चल रहा हो तो अत्यन्त शुभ रहता है।

न्यायालय में विजय
१॰ तीन साबुत काली मिर्च के दाने तथा थोड़ी-सी देसी शक्कर मुंह में चबाते हुए निकल जाएं (जिस दिन न्यायालय जाना हो) अनुकूलता रहेगी।
२॰ जिस नासिका से श्वास चल रहा हो, वही पाँव प्रथम बाहर रखें। यदि दाहिनी नासिका से श्वास चल रहा हो तो अत्यन्त शुभ रहता है।
३॰ गवाह मुकर रहा हो या जज विपरीत हो तो विधिपूर्वक हत्थाजोड़ी साथ ले जाने से चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न होता है।

रोग शान्ति
१॰ घर के सदस्यों की संख्या + घर आये अतिथियों की संख्या + दो-चार अतिरिक्त गुड़ की बनी मीठी रोटियां, प्रत्येक माह कुत्ते तथा कौए इत्यादि को खिलानी चाहिए। इससे साध्य तथा असाध्य दोनों ही प्रकार के रोगों की शांति होती है। यह रोटी तन्दूर या अग्नि पर ही बनाएं, तवे आदि पर नहीं।
२॰ प्रत्येक शनिवार को प्रातः पीपल को तीन बार स्पर्श करके शरीर पर हाथ फेरना तथा जल, कच्चा दूध तथा गुड़ (तीनों किसी लोटे में डाल कर) पीपल पर चढ़ाना भी लाभकारी होता है।
३॰ दवा आदि से रोग नियंत्रित न हो रहा हो तब-
शनिवार को सूर्यास्त के समय हनुमानजी के मन्दिर जाकर हनुमान जी को साष्टांग दण्डवत् करें तथा उनके चरणों का सिन्दूर घर ले आयें। तत्पश्चात् निम्न मंत्र से उस सिन्दूर को अभिमन्त्रित करें- “मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।”
अब उस सिन्दूर को रोगी के माथे पर लगा दें।
४॰ जो व्यक्ति प्रायः स्वस्थ रहता हो, जिसे कोई विशेष रोग न हुआ हो, उस व्यक्ति का वस्त्र रोगी को पहनाने से तुरन्त स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है।

दुर्घटना से रक्षा
१॰ वाहन में विधिवत् प्राण प्रतिष्ठित वाहन-दुर्घटना-नाशक “मारुति-यन्त्र” स्थापित करें।
२॰ जिस नासिका से स्वर चल रहा हो, थोड़ा-सा श्वास ऊपर खींचकर वही पांव सर्वप्रथम वाहन पर रखें।
३॰ वाहन पर बैठते समय सात बार इष्टदेव का स्मरण करते हुए स्टेयरिंग को स्पर्श करें तथा स्पर्शित हाथ माथे से लगाएं।
४॰ घर से निकलते समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करने चाहिए।
५॰ अपनी और अपने वाहन की सुरक्षा के लिए आठ छुहारे लाल कपड़े में बांधकर अपनी गाड़ी या जेब में रखें।
६॰ वाहन दुर्घटना के लिए एक सरलतम उपाय यह है कि घर से बाहर जाते समय श्रद्धापूर्वक बोलें कि “बजरंगा ले जायेगा ते बजरंगा ले आयेगा”